‘परमहंस भरतगीता’ को आत्मबोध का सर्वोच्च शिखर माना जाता है। महाभारत से बहुत पहले, हमारी ज्ञान परम्परा का यह प्राचीनतम लिखित सबूत है। महर्षि वेद व्यास ने इसे श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कन्ध में, पृथ्वी के आरम्भिक सम्राटों के वंश के इतिहास के बाद, आरम्भिक चौदह अध्यायों में समझाया है।
यह गीता आरम्भिक तौर पर सिन्धु-सौवीर देशों के संयुक्त सम्राट रहूगण के साथ एक मूर्ख लगनेवाले कहार की बातचीत के रूप में आरम्भ होती है। राजा की पालकी के एक कहार के चोट खाने के बाद, उन्हीं के सैनिक घने जंगल से इस कहार को पकड़ लाए हैं। इस कहार से जब राजा की बातचीत होती है, तब धीरे-धीरे आध्यात्मिक ज्ञान की अनजानी परतें खुलती हैं। पता चलता है कि जिसे सम्राट एक पगलाया गँवार समझ रहा था, वह तो संसार के आरम्भिक सम्राटों की परम्परा में हुआ, ऐसा परमहंस ज्ञानी है जिसे अपने तीन पूर्व जन्मों का भी ज्ञान है। यह गीता समझाती है कि अध्यात्म की दुनिया में छोटी-सी आसक्ति भी किसी साधक को उसके रास्ते से दूर भटका सकती है; भले ही वैराग्य से परमात्मा को पाना बहुत आसान है, लेकिन उसे पाने के और भी कई तरीके हैं जिनको समझने के बाद कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता।
परमहंस भरतगीता समझाती है कि जब तक कोई अहंकार की पालकी से वास्तविकता की जमीन पर नहीं उतरता, तब तक वह परमात्मा को अनुभव कर ही नहीं सकता—जब देह का बोध मिटता है, तभी कोई मानव परमहंस बनता है।


