अंग्रेज़ों के शासनकाल के दौरान जिस तरह की नीतियाँ चलाई गर्इं उनके कारण पश्चिम बंगाल में कृषि संकट स्थायी रूप से गहरा गया और उससे उत्पन्न सामाजिक–आर्थिक परिस्थितियों ने वहाँ जन–आन्दोलनों को जन्म दिया। इन आन्दोलनों में कम्युनिस्ट पार्टी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही जिसका सिलसिलेवार ब्योरा इस पुस्तक में मिलता है।
संयुक्त मोर्चा सरकारों के काल में जिस तरह भूमि सुधार आन्दोलन व्यापक रूप से प्रारम्भ हुआ था, उसे वाममोर्चा सरकार ने उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाया और पश्चिम बंगाल पूरे भारत में सच्चे भूमि सुधार के एक आदर्श राज्य के रूप में उभरकर सामने आया। पश्चिम बंगाल में पूरे भारत की सिर्फ़ अढ़ाई प्रतिशत ज़मीन होने पर भी सारे भारत में भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत सरकार द्वारा भूमिहीनों के बीच बाँटी गई कुल ज़मीन का 20 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम बंगाल का है। इसके साथ ही त्रि–स्तरीय पंचायत व्यवस्था और स्वशासी निकायों ने बंगाल के गाँवों में शक्तियों के सन्तुलन को बदल दिया है और इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में भी वृद्धि के नए रिकार्ड क़ायम हुए हैं। लेखक ने इस समूचे घटनाक्रम को एक ‘मौन क्रान्ति’ की संज्ञा दी है। इस समूचे उपक्रम में सरकार की भूमिका के साथ ही पार्टी और उसके जन–संगठनों की जो भूमिका रही है, वह इस पुस्तक में तमाम तथ्यों के साथ उभरकर सामने आई है।
निश्चय ही यह न केवल राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए एक ज़रूरी पुस्तक है, बल्कि आम पाठकों के लिए भी यह जानने का प्रामाणिक स्रोत है कि पश्चिम बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकारों ने कैसे इस आन्दोलन को इसकी सफल परिणति तक पहुँचाया।

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