‘पीढ़ियाँ बोलती हैं’ कविता-संग्रह आदिवासी काव्यधारा के उस जीवन्त स्रोत से जन्मा है जहाँ वाचिक परम्परा, सामुदायिक स्मृति, प्रकृति सापेक्ष जीवन-दृष्टि और समकालीन यथार्थ एक-दूसरे से संवाद करते हैं। जनार्दन की कविताएँ केवल लिखित शब्द नहीं हैं, बल्कि वे उस आदिवासियत की प्रतिध्वनि हैं जो सदियों से गीतों, कथाओं, मिथकों, उत्सवों और सामूहिक अनुभवों के माध्यम से हमारे बीच मौजूद रही हैं।
ये कविताएँ आदिवासियत को रूमानी नहीं बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक चेतना के रूप में सामने लाती है। इस संग्रह में कवि ने भाषा, इतिहास, धर्म, सत्ता और स्मृति के प्रश्नों से जूझते हुए उन प्रक्रियाओं की पहचान किया है जिनके माध्यम से आदिवासी ज्ञान, प्रतीकों और पूर्वजों का सांस्कृतिक अधिग्रहण किया गया है। जहाँ ‘तुम शब्दों से खेलते हो’ जैसी कविताएँ भाषा और अर्थ पर नियंत्रण की राजनीति को उजागर करती हैं, वहीं ‘सड़सी-कुटासी’, ‘माटी-कंकड़ और धान की बाली’ जैसी रचनाएँ आदिवासी ज्ञान-परंपराओं को उनकी अपनी दार्शनिक भूमि पर पुनर्स्थापित करती हैं।
संग्रह केवल अतीत का स्मरण या आदिवासी स्वर्ण-युग का दावा नहीं करता बल्कि आधुनिक समय की विडंबनाएँ, युद्ध, साम्प्रदायिकता, जाति-वर्चस्व, विस्थापन, लोकतंत्र, संविधान और वैश्विक मानवीय संकट के भयावह वर्तमान की बात भी करता है। लेकिन उसकी संवेदना हमेशा धरती, श्रम, समुदाय और इंसानियत से जुड़ी रहती है। यह सिर्फ एक कविता-संग्रह नहीं, बल्कि आदिवासी ज्ञान-दृष्टि, सांस्कृतिक स्वायत्तता और इनसानी सह-अस्तित्व के पक्ष में दर्ज एक सशक्त काव्य-घोषणा है।
वाचिक आदिवासी कविता की लय, सम्बोधन शैली, सामूहिकता और सामूहिक-स्मृति को आधुनिक काव्य-चेतना के साथ संयोजित करते हुए यह संग्रह हिन्दी कविता में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप करता है।
—वंदना टेटे


