प्रवासी हिन्दी साहित्य उसे कहा जाता है जो भारत से बाहर बसे हिन्दी भाषी प्रवासियों द्वारा रचा गया है। भारतीय भाषा एवं संस्कृति को विदेशी भूमि पर सुरक्षित रखने के लिए सेतु का काम करता है यह साहित्य। इसमें देश-परदेश की संवेदनाएँ, विस्थापन का दर्द, सांस्कृतिक द्वंद्व और स्व की रक्षा आदि विषय प्रमुख रूप से चित्रित किये जाते रहे हैं। प्रवासी हिन्दी साहित्य का आरम्भ सामान्यत: 19वीं से 20वीं सदी के बीच हुआ। ब्रिटिश शासन काल में भारतीयों को मज़दूर के रूप में कैरेबियन देशों, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी, यूएसए, ब्रिटेन आदि देशों में ले जाया गया। समय के साथ वे वहीं बस गए। इस निवास में उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से अपनी भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखा। स्वतंत्रता के बाद उच्च शिक्षा, रोज़गार एवं व्यापार के बहाने से प्रवासी भारतीयों का 'प्रवास' नये रूप-रंग के साथ हुआ। यह प्रवास ज़बरदस्ती का न होकर स्वेच्छा से था। प्रवासी भारतीयों ने अपने प्रवास में जो अनुभव किया उसी को अपने लेखन का विषय बनाया।
आधुनिक तकनीकी संसाधनों की सुविधाओं के कारण विदेशों में रचित हिन्दी साहित्य पाठकों तक अत्यन्त कम समय में उपलब्ध होता है। साथ ही लेखकों तक इसकी प्रतिक्रिया भी शीघ्र ही प्राप्त होती है। इंटरनेट, ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाएँ, ई-बुक्स आदि के कारण साहित्य का प्रकाशन भी आसानी से होता है। इससे प्रवासी हिन्दी साहित्य को विश्व के कोने-कोने में पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होती।


