जयशंकर प्रसाद का सम्पूर्ण कृतित्व हिन्दी के आकाश पर उस चन्द्रमा के समान प्रकाशित है जिसकी आभा कभी कम नहीं होगी। प्रसाद ने कविता के साथ नाटक भी लिखे और उनके नाटक सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की उपलब्धि माने जाते हैं। आधुनिक स्त्री विमर्श के बहुत पहले 1933 में लिखे गए ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक को स्त्रीवादी रचना भी माना जाता है। अपने आत्मसम्मान के लिए जानी जाने वाली ध्रुवस्वामिनी इस नाटक की नायिका है जो अपने पति के विरोध में खड़ी हो जाती है।
हिन्दी आलोचना और रंग आलोचना में जयशंकर प्रसाद अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के साथ विवादित भी रहे हैं। उनके नाटकों की रंगमंचीयता के सम्बन्ध में अक्सर सवाल होते रहते हैं तथापि उनके पाठ के महत्त्व से किसी की असहमति नहीं।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘ध्रुवस्वामिनी’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
प्रसाद जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।


