नई शताब्दी के आगमन के उत्साही दिनों में जिस किताब ने हिन्दी के संसार को एकाएक चौंकाकर जैसे ठहरे हुए पानी में कंकर फेंक दिया था वह कवि-कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ थी। ‘जूठन’ ने भारतीय समाज के सबसे बड़े विकार जाति-प्रथा के कड़वे और स्याह पक्ष को इस बेधकता के साथ उजागर किया कि दलित साहित्य की अर्थवत्ता स्वत: प्रमाणित हो गई। अब सहानुभूति और स्वानुभूति का अन्तर किसी को भी समझ आ सकता था। कहना न होगा कि ‘जूठन’ ने न केवल दलित साहित्य बल्कि कथेतर साहित्य में भी जड़ताभंजक कृति का इन्तजार समाप्त किया।
‘जूठन’ ने बताया कि स्वतंत्रता के पचास वर्ष बाद भी आधुनिक भारतीय समाज के भीतर कैसी कुंठा और जकड़न है। वाल्मीकि जी के अनुभव किताबी नहीं थे बल्कि जीवन की नग्नतम सच्चाइयों का उद्घाटन कर रहे थे। उनके पास अपने तीखे यथार्थबोध के साथ पाठकों के मर्म तक जाने वाली प्रभावशाली भाषा भी थी, जो हिन्दी पाठकों के लिए सर्वथा नया अनुभव ही बना।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘जूठन’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
वाल्मीकि जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।

