हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के समापन के साथ ही आधुनिकता का दौर शुरू हुआ जिसे नवजागरण और स्वतंत्रता आन्दोलन ने उरूज पर पहुँचाया। आधुनिकता की कुछ अनिवार्य पहचानों में से एक है महाकाव्य का विलोप। तब भी छायावाद के अग्रणी कवि जयशंकर प्रसाद ने महाकाव्य लिखा और उनके महाकाव्य ‘कामायनी’ को हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ काव्य ग्रंथों में माना जाता है। लगभग एक शताब्दी पूर्व लिखे गए इस महाकाव्य के प्रकाशन के नौ दशक पूरे हो चुके हैं और कामायनी का सन्देश आज विश्व मानवता के लिए आवश्यक मार्ग बन गया है।
छायावादी काव्य की प्रौढ़ता और परिपक्व सौन्दर्य का प्रतीक यह महाकाव्य जयशंकर प्रसाद की मेधा और कौशल का अप्रतिम उदाहरण है। पन्द्रह सर्गों में निबद्ध इस महाकाव्य को हिन्दी के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण आलोचकों ने अपने अध्ययन का विषय बनाया।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘कामायनी’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
प्रसाद जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।


