किसी भी भाषा में कभी-कभी ऐसा होता है कि एक कहानी या एक कविता को पाठकों का इतना अधिक प्रेम मिले कि वह कालजयी हो जाती है। अपने मूल कलारूप के साथ अन्य कलारूपों में भी उसे देखने-समझने के प्रयास होते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ ऐसी ही रचना है जो एक लघु पत्रिका में छपी और धीरे-धीरे उसे हिन्दी की सबसे अधिक लोकप्रिय कहानियों में गिना जाने लगा। उस पर फिल्म बनी, उस पर नाटक खेले गए और उस पर कवियों ने कविताएँ भी लिखीं।
‘तीसरी कसम’ की ऐसी व्यापक लोकप्रियता का कारण उसमें अभिव्यक्त जीवन के सबसे सच्चे, सबसे कोमल और सबसे पवित्र क्षणों का मार्मिक उद्घाटन ही होना चाहिए। रेणु की इस कहानी को फिल्म जगत ने भी ऊँचाई दी जहाँ कहा जा सकता है कि निर्देशक ने रचना की आत्मा को फिल्म में हूबहू उतार दिया। यह भी हमारी कला-संस्कृति की दुर्लभ घटना ही है। आकस्मिक नहीं कि इस कहानी और इस पर बनी फिल्म पर बार-बार आलोचकों-समीक्षकों का ध्यान गया और इस पर व्यापक चर्चा होती रही।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
रेणु जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।


