प्रस्तुत पुस्तक रहीम की पुराख्यान के प्रति दृष्टि को नवीनता से अवगत कराती है। रहीम ने अपने काव्य में पुराख्यानों का भरपूर उपयोग किया है और तत्कालीन समय के प्रसंगों में उसे सार्थक करते नज़र आते हैं आज भी उनके प्रयोगात्मक पुराख्यान प्रासंगिक ही हैं। रहीम हिन्दू धर्म-सम्प्रदाय के गहरे जानकार हैं और कहीं-कहीं तो ऐसे पुराख्यानों का प्रयोग काव्य में कर गये हैं कि जिनके प्रमाण शास्त्र भी न दे पाते हैं इसलिए कहा जा सकता है कि उनकी पकड़ लोक पर भी सशक्त थी। रहीम पर अबतक इस तरह का शोधात्मक कार्य कहीं देखने में नहीं आया है एक कमी हिंदी जगत में इस प्रकार के कार्य की अनुभव में आ रही थी और इस कमी को पूर्ण करने के लिए यह बीड़ा उठाना ही पड़ा। न केवल रहीम की दृष्टि पुराख्यानों के प्रति सजग रूप में दर्शायी गयी है, बल्कि पुराख्यान और मिथक पर भी गहरी छानबीन और आलोचनात्मक दृष्टि को आलोचकीय रूप दिया गया है। रहीम के कई पक्षों को दर्शाते हुए रहीम के समन्वय रूप, समाहार शक्ति और हिंदू-मुस्लिम एकता को भी समायोजित करने का प्रयास किया है। निश्चित ही पुस्तक रहीम के काव्य पर किये गये शोधात्मक कार्यों को एक नई दृष्टि से पाठकों के समक्ष रखती है, जिससे रहीम के काव्य के प्रति नई दृष्टि का विस्तार उभरकर आता है और रहीम का काव्य नए रूप में पुनर्स्थापित होता है। पुस्तक में रहीम के जीवन के भी कई ऐसे पक्ष प्रस्तुत हैं, जिसमें रहीम के व्यक्तित्व पर पुनर्विचार किया गया है रहीम अपने समय के एक श्रेष्ठ, सशक्त और बेहतरीन रचनाकार रहे हैं न केवल रचनाकार रहे साथ-ही-साथ लोक को गहरे रूप में अपनाते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक रहीम के काव्य के कई नवीन आयामों को पाठकों को परिचय कराती है।

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