गहरे अनुशीलन से प्राप्त इन बिखरी हुई मुक्तमणियों को संग्रहित करते हुए मेरी दृष्टि इनके माध्यम से यथासम्भव न केवल रामभक्ति-काव्य धारा का श्रृंखलाबद्ध वृत्त प्रस्तुत करने की ओर रही है, वरन् इस श्रृंखला की कुछ अज्ञात और अननुसन्धानित कड़ियों को विद्वज्जनों के समक्ष प्रस्तुत करने तथा नवीन सन्दर्भ में सामान्यतः समस्त रामभक्ति काव्य और विशेषतः तुलसीदास के काव्य का आस्तिक दृष्टि से मूल्यांकन करने की ओर भी रही है।

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