प्रस्तुत कृति में आचार्य वाजपेयी ने रसिंचतन की क्रमागत सरणि का उपस्थापन तो किया ही है, उससे हटकर स्वतंत्र और तटस्थ विचार भी किया है। उनकी धारणा थी कि संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा में अपर विचारों और सारणियों के संबंध में विचार-विमर्श प्राय: स्थिर और अगतिक हो गया है। उसे पुन: नई गति और दिशा देनी होगी। तभी भारतीय साहित्यिंचतन में अधिक विशदता आ सकेगी। इसी उद्देश्य से उनका संकल्प था कि पौरस्त्य ‘रस’ चिंतन और पाश्चात्य ‘सौन्दर्य’-निरूपण—दोनों को ध्यान में रखकर वर्तमान हिंदी रचनात्मक साहित्य के संदर्भ में काव्यशास्त्र को और आगे बढ़ाया जाए।
प्रस्तुत कृति में प्राक्शुक्ल रसनिष्पत्ति पर संस्कृत काव्यशास्त्र की सरणि का अनुभावन है।


