“महिलाओं के साथ दिन भर में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं जिन पर, यदि वे गम्भीरता से सोचें तो भारतीय परिवारों की चिन्दियाँ उड़ जाएँ।”
सपनों की होम डिलीवरी नए ज़माने के करवट बदलते रिश्तों को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है। रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो, माता-पिता और सन्तान का हो या प्रेमी-प्रेमिका का; ईमानदारी से देखें तो हर रिश्ता नए वक़्त के साथ ताल बिठाने की कोशिश कर रहा है। दोष किसी का नहीं है, शायद हर युग अपने सामाजिक संजाल को ऐसे ही बदलता होगा।
लेखिका इस उपन्यास में दोषी किसी को नहीं ठहरातीं। न किसी पात्र का पक्ष लेती हैं, न किसी को आरोपों के कटघरे में खड़ा करती हैं। सिर्फ़ उनकी कहानी बयान करती हैं जो एक तरफ़ अपनी निजी पहचान को तो दूसरी तरफ़ रिश्तों की ऊष्मा को बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। शायद यही वह मूल संघर्ष है जिसमें से आज हम सबको गुज़रना पड़ रहा है। एक तरफ़ वयस्क होती वैयक्तिकता है जिसे अपना निजी स्पेस चाहिए और दूसरी तरफ़ समाज के पुराने सांचे हैं जिनमें यह चीज़ अँट नहीं पाती। नतीजा भीतर-बाहर की टूट-फूट और यंत्रणा।
उपन्यास की नायिका रुचि एक असफल विवाह से निकलकर अपनी ख़ुद की पहचान अर्जित करती है। दूसरी तरफ़ सर्वेश है। वह भी अपने पहले विवाह से बाहर आ चुका है। दोनों का अपना एक-एक बच्चा भी है। और संयोग कि रुचि का अपना बेटा पारिवारिक टूटन के कारण जिस ख़तरनाक रास्ते पर जा रहा है उसी रास्ते पर चलता हुआ सर्वेश का बेटा पहले ही जीवन से हाथ धो चुका है। यही बिन्दु इन दोनों के निजी स्पेस को स्थायी रूप से जोड़कर एक नया, बड़ा स्पेस बनाता है।
अत्यन्त पठनीय और सारगर्भित उपन्यास।


