'सत्यापन' संग्रह में शामिल कहानियाँ विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चाई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रौशनी भी है। यही वजह है कि ये कहानियाँ शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझातीं। इसके बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव सम्भव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आन्तरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिन्दी दलित-लेखन की सशक्त बानगी इस संग्रह की कहानियों में दिखती है।
- धर्मेन्द्र सुशान्त हिन्दुस्तान
'सत्यापन' एक बड़ी सम्भावना की ओर इशारा करती है - हिन्दी अस्मितामूलक लेखन के एक नये दौर में प्रवेश करने की सम्भावना। 'सत्यापित' कहानी एक मार्मिक रूपक ही नहीं निर्मित करती बल्कि इस बात की खोज करती है कि कैसे एक ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया मानवीय अस्तित्व को परिभाषित करने वाली दार्शनिक कैटेगरी में बदल जाती है।
- गिरिराज किराडू बीबीसी हिन्दी


