‘सीन : 75’ कथा है बम्बई के फिल्म-जगत की जिसे आज हम बॉलीवुड के नाम से जानते हैं। राही मासूम रज़ा के इस छोटे लेकिन बहुअर्थगर्भी उपन्यास में इसी दुनिया के महत्त्वाकांक्षी, चालाक और सफलता के लिए कुछ भी कर जानेवाले लोगों की कहानी कही गई है।
अली अमजद बनारस जैसे पारम्परिक शहर से बम्बई आता है—स्क्रिप्ट राइटर बनने और यहाँ आकर उसके सामने खुलती है उस दुनिया की घिनौनी हकीकत जहाँ वह सितारा बनना चाहता था। उसके जैसे और भी कई हैं जो इस जगमगाती दुनिया में पैर जमाने और कुछ कर दिखाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहानियों से कहानियाँ निकलती हैं और यह उपन्यास एक घूमते कैमरे की तरह हमें ऐसे अनेक पात्रों से मिलवाता चलता है जो अपनी कारुणिक त्रासदियों से गुजरते हुए एक सपने का पीछा कर रहे हैं। धनाढ्य लेस्बियंस, संघर्षरत निर्देशक, लिजलिजे निर्माता, उनकी सनकें और चालाकियाँ।
गहरे व्यंग्य और तुर्श हास्यबोध के साथ यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम तनाव, वर्गीय रिश्तों और कामयाबी की खींचतान में उधड़ते मानवीय रिश्तों की कहानी भी कहता है। राही मासूम रज़ा ने हिन्दी सिनेमा की दुनिया के स्याह-सफेद को बहुत नजदीक से देखा-समझा था। यह उपन्यास इसका प्रमाण है।

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