स्त्री-अधिकारों का औचित्य साधन को स्त्री मुक्ति-विमर्श की पहली क्लासिक कृति माना जाता है। इस कृति में मेरी ने तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली की पुरुष-केन्द्रित दृष्टि को आड़े हाथों लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी समाज तब तक वास्तविक अर्थों में समतावादी नहीं हो सकता जब तक उसमें स्त्रियों को समान अधिकार और अवसर न मिल जाएँ। कहना आवश्यक नहीं है कि स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में यह पुस्तक सिर्फ़ एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वर्तमान दौर के लिए भी एक अनिवार्य पाठ है।

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