जीवनानन्द दास की काव्य-प्रतिष्ठा उनकी कुछ लोकप्रिय कविताओं तक सीमित नहीं है; उनकी वास्तविक रचनात्मक महत्ता उस विस्तृत और बहुपरतीय काव्य-संसार में निहित है, जिसकी अनेक दिशाएँ अब भी पाठकों के लिए अपरिचित हैं। ‘सुदूर नक्षत्रों के उजास में’ संकलन उन्हीं उपेक्षित रचनाओं के माध्यम से जीवनानन्द के कवि-व्यक्तित्व को उसकी अधिक व्यापकता और विविधता में देखने का अवसर देता है।
जीवनानन्द के यहाँ प्रकृति महज दृश्य नहीं, स्मृति और अनुभूति का गहन प्रदेश है; प्रेम केवल आकर्षण नहीं, विरह, एकान्त और अनिश्चितता से निर्मित अनुभव है; मृत्यु जीवन का निषेध नहीं, बल्कि उसकी अर्थवत्ता को परखने वाली उपस्थिति है। खेत, नदी, पक्षी, धुन्ध, सन्ध्या और चाँदनी से लेकर आधुनिक नगर की उदासी तक उनके बिम्ब एक ऐसे संसार का निर्माण करते हैं, जहाँ निजी अनुभव के भीतर इतिहास, समय और सभ्यता की दूरगामी छायाएँ लगातार सक्रिय रहती हैं। मनुष्य की निस्संगता, सभ्यता के क्षरण और समय के साथ बदलती उसकी आत्मचेतना उनकी कविता को असाधारण गहराई प्रदान करती है।
उनकी काव्य-भाषा इस अनुभव-संसार का अभिन्न अंग है—अप्रत्याशित शब्द-संयोजन, विरल उपमान, दृश्यात्मक बिम्ब तथा ध्वनि और लय के सूक्ष्म अनुशासन से निर्मित ऐसी भाषा, जो परिचित वस्तुओं को भी अपरिचित आलोक में उपस्थित करती है।
जीवनानन्द की मृत्यु के बाद प्राप्त उनकी पांडुलिपियों से चुनी गई सौ से अधिक कविताएँ पहली बार इतने व्यापक रूप में हिन्दी में उपलब्ध हो रही हैं। इनमें जीवनानन्द के परिचित स्वर के साथ उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के अनेक अनदेखे आयाम भी सामने आते हैं। इस अर्थ में यह संग्रह केवल कुछ अप्रकाशित कविताओं की प्रस्तुति नहीं, बल्कि जीवनानन्द दास के काव्य को उसके व्यापकतर परिप्रेक्ष्य में पुनः पढ़ने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है।


