“कौन हो... कौन हो तुम?”... मैंने आँखें मलते हुए पूछा। “जिसकी प्रतीक्षा कर-करके तुम थक कर सो गये, मैं वही लक्ष्मी देवी हूँ बेटा!”...
“झूठ। लक्ष्मीजी ऐसी काली कभी नहीं हो सकतीं। वे तो उजली-उजली और अत्यधिक सुन्दर हैं... मैंने कई बार कलेण्डरों में उनकी तस्वीर देखी है।”
“सच है बेटा, मैं लक्ष्मी ही हूँ” उस स्त्री ने गम्भीर आवाज में कहा, “पर दो नम्बरी!”
यह एक व्यंग्यांश है, जो समकालीन अर्थ-जगत के एक सर्वमान्य सच को सामने रखता है और इस संग्रह ‘सुना अनसुना’ में इस कोटि के कितने ही व्यंग्य शामिल हैं। गुजराती के सुविख्यात व्यंग्य लेखक विनोद भट्ट आज की सामाजिक, राजनीतिक विद्रूपताओं को जिस अन्दाज से उघाड़ते हैं, वह हमारे लिए अविस्मरणीय हो उठती हैं। इसके लिए लेखक ने अनेकानेक पौराणिक प्रसंगों, लोक-कथाओं, पंचतंत्र और ईसप की कथाओं का उपयोग किया है। इससे ये व्यंग्य-रचनाएँ एक विशिष्ट वस्तु रूप में तो हमारी चेतना का नया संस्कार करती हैं, अपनी शैलीगत सहजता और रोचकता से भारत की वाचिक कथा-परम्परा को भी समृद्ध करती हैं।


