‘तिमिरपंथी’ गुजराती भाषा के ख्यात कथाकार ध्रुव भट्ट का बहुचर्चित उपन्यास है। यह उन लोगों की कहानी है जिनके समुदाय को औपनिवेशिक भारत के अंग्रेज शासकों ने ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था। शासन और शेष समाज की नजर में वे चोर थे—लांछित, अवांछित! लेकिन यह कितना सच था? चोरी उनका अपराध थी अथवा कला या विद्या और उन्होंने यह कला कहाँ से पाई थी?
खानाबदोश ‘आडोडिया’ समुदाय के लोगों के असल जीवन-अनुभवों पर आधारित यह उपन्यास चोरों की तीन पीढ़ियों की कहानी है, जो वर्तमान के धरातल पर पहुँचकर बतलाता है कि आज वे लोग क्या सोचते हैं और आज उनकी स्वीकार्यता, अस्तित्व और प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष क्यों आवश्यक है। क्या तथाकथित मुख्यधारा का समाज विलुप्त होने की कगार पर खड़ी उनकी कला को समझ सकता है जिसकी अपनी नैतिकता और अपने नियम हैं, और जो गुरुओं व पूर्वजों के आदेश से भी बँधा है। उपन्यास के पन्नों से गुजरते हुए यह सवाल भी लगातार गहराता जाता है कि चोरी कौन नहीं करता?
‘तिमिरपंथी’ के किरदारों से एक बार मिल लेने के बाद उन्हें भुला पाना सम्भव नहीं।

