प्रस्तुत पुस्तक ‘उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास’ आलोचना की एक किताब-भर नहीं
है। वह जहाँ उपन्यास की सैद्धान्तिकी, प्रतिसैद्धान्तिकी बनाता है, वहीं हमारे
समाज का आईना भी है।
क्या उपन्यास एक सामाजिक संस्था है जैसे निबन्ध छपते-छपते चर्चा में आ गये। लेखक के अनुसार जहाँ किस्सागोई जरूरी है, वहीं सामाजिक प्रश्नों पर जिरह भी जरूरी है। आज उपन्यास पहले-जैसा इकहरा एकरेखीय नहीं है। कहीं वह काव्यात्मक है कहीं नाटकीय। उसमें विभिन्न विधाओं की आवाजाही है।
‘उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास’ साक्ष्य है कि आज स्त्री, दलित, आदिवासी उपन्यास के केन्द्र में हैं। उपन्यास साम्प्रदायिक उन्माद पर चोट करता है और इस अर्थ में प्रेमचन्द पर नया भरोसा जताता है।
इस कृति को समाज से रू-ब-रू होने की कोशिश कहा जा सकता है। उपन्यास में जहाँ वैश्विक विमर्श हैं, वहीं स्थानीय आंचलिक प्रश्न भी हैं।
आशा है, पुस्तक नये विवादों की पृष्ठभूमि में नयी सार्थकता अर्जित करेगी।


