कथा आलोचक के रूप में गोपाल राय का नाम रेखांकित होता रहा है। 'उपन्यास की पहचान' श्रृंखला में उन्होंने कई उपन्यास कृतियों का विवेचन, विश्लेषण और पाठपरक मूल्यांकन किया है। इस कड़ी में 'महाभोज' वस्तुतः 'उपन्यास की पहचान' श्रृंखला की छठी पुस्तक है।
'महाभोज' की विषयवस्तु का पाठकीय प्रभाव न केवल इस उपन्यास को हस्तक्षेपकारी बनाता है बल्कि मन्नू भंडारी के उपन्यास-संसार में कभी ओझल न होनेवाला कथानक मोड़ भी रचता है। इस उपन्यास पर लिखते हुए गोपाल राय न केवल इसके कथा-संसार, कथ्य, पात्र, शिल्प और भाषा जैसे आलोचना के पारम्परिक मानकों का सहारा लेते हैं बल्कि 'महाभोज' जैसे राजनीतिक उपन्यास में अन्तर्निहित व्यंग्य के पैनेपन, राजनीतिक उपन्यासों की परम्परा में 'महाभोज' का स्थान और मन्नू भंडारी की औपन्यासिक-यात्रा के पड़ावों का भी परिचय देते हैं। सही अर्थों में यही 'उपन्यास की पहचान' श्रृंखला की सोद्देश्यता भी कही जा सकती है।
मन्नू भंडारी ने इस उपन्यास में अपने समय के राजनीतिक घटनाक्रम को रेखांकित करते हुए व्यवस्था की जकड़बन्दी को दिखाया है। इस तरह उन्होंने लोकतंत्र की ओट में पलती-बढ़ती उन शक्तियों को उजागर किया है, जो असल में इस तंत्र के और लोक—आमजन—के शत्रु हैं। इक्कीसवीं सदी में जब उपन्यास की अनिवार्यता का प्रश्न दोहराया जाने लगा है, 'महाभोज' पर केन्द्रित यह आलोचना-पुस्तक पाठक को एक नई दृष्टि देती है और उसे सोचने-विचारने के लिए एक प्रासंगिक प्रस्थान उपलब्ध कराती है।


