सत्यनिष्ठा से की गई भक्ति अपात्र मान लिए गए व्यक्ति को भी अनुकरणीय और आदर्श पात्रता प्रदान करती है। इसकी शक्ति से देवताओं से युद्ध और जीवन हारनेवाला भी अमर-विजेता कहला सकता है? क्या मृत्यु के सामने खड़ा व्यक्ति भी पूर्ण शान्ति और समर्पण में स्थिर रह सकता है?
इसका प्रमाण हैं—ऋग्वेद से लेकर ‘महाभारत’ के शान्तिपर्व और ‘श्रीमद्भागवत’ महापुराण के छठवें स्कन्ध में वर्णित वृत्रासुर के प्रसंग। इन प्रसंगों में निहित ‘वृत्रगीता’ जीवन-मृत्यु-मोक्ष के बारे में हमारी सामान्य समझ को एक नई दिशा देती है और मृत्यु के समक्ष भी पूर्ण शान्ति और समर्पण में स्थिर रहने की शक्ति प्रदान करती है।
‘वृत्रगीता’ एक दुर्लभ आध्यात्मिक प्रस्तुति है, जिसमें एक असुर के माध्यम से कर्म, ज्ञान, कर्तव्य और भक्ति के गहरे सत्य प्रकट होते हैं। यह हमें सिखाती है कि शक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण है दृष्टि, परिस्थितियों से अधिक महत्त्वपूर्ण है मन की स्थिति और बाहरी जीत से अधिक महत्त्वपूर्ण है आन्तरिक शान्ति।
अत्यन्त सरल भाषा में प्रस्तुत यह पुस्तक वेदों, उपनिषदों, रामायण, गीता, महाभारत, भागवत तथा आधुनिक वैज्ञानिक सन्दर्भों के साथ पाठक को एक ऐसा जीवन-दर्शन देती है, जो सभी को शान्ति और आत्म-जागरण का प्रकाश देगी।


