व्यंग्य, वह चाहे किसी भी विधा में हो, कहानी, कविता, लेख, उपन्यास, फ़िल्म, कार्टून कुछ भी, उसकी एक अनिवार्य शर्त उसकी समकालीनता है। एक मायने में सारी साहित्यिक या कला विधाओं के साथ यह ज़रूरी है, लेकिन व्यंग्य के साथ यह समकालीनता ज़्यादा स्पष्ट और सीधी होनी चाहिए।
हिन्दी में एक दौर में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे व्यंग्यकारों की वजह से व्यंग्य सर्वाधिक लोकप्रिय लेखन विधा बन गया और तमाम अख़बारों, पत्रिकाओं में व्यंग्य छपना अनिवार्य हो गया, हालाँकि अब काफ़ी हद तक स्थिति बदल गई है। लेकिन व्यंग्य की लोकप्रियता के दौर में बहुत सारे व्यंग्यकारों ने परसाई और शरद जोशी की शैली में या उनकी नक़ल में व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया। अब व्यंग्य एक शैली बन गया, न कि परसाई और शरद जोशी की तरह समकालीन यथार्थ से जूझने का माध्यम रहा। ऐसा सबके साथ नहीं हुआ, लेकिन बहुत सारे व्यंग्यकारों के लिए यह अपने वक़्त की चुनौतियों से बचने का सुरक्षित रास्ता बन गया।
अब के दौर में जब सत्ता, आलोचना और व्यंग्य पर कुछ ज़्यादा मेहरबान है, यह बचने की प्रवृत्ति बहुत उभर कर सामने आती है। अनूप मणि त्रिपाठी का लेखन इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि वे व्यंग्य के लिए व्यंग्य न लिखकर अपने समय के यथार्थ से बेचैन हो कर व्यंग्य लिखते हैं। यही बेचैनी उनका रूप और कथ्य दोनों निर्धारित करती है जैसा कि उनके इस ताज़े संग्रह ‘वेलकम टू कॉकरोचलैंड’ से स्पष्ट है। उनमें एक बेचैन अधीरता है, जो अन्याय को बर्दाश्त न करने और उससे टकराने के साहस और संवेदनशीलता का प्रमाण है। यह सुरक्षित व्यंग्य नहीं है, यह जोखिम लेने वाली अभिव्यक्ति है, सीधे चोट करने वाली। इसीलिए इसमें एक खुरदरापन और ताज़गी है। यह सच्चे अर्थों में हमारे वक़्त का प्रामाणिक और प्रतिनिधि व्यंग्य है।
—राजेन्द्र धोड़पकर


