केरल को नवजागरण के रास्ते पर ले जाने में श्रीनारायण गुरु की देन सर्वोपरि है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारत के विभिन्न प्रदेशों में राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे मनीषियों के नेतृत्व में समाज-सुधार सम्बन्धी आन्दोलन जोर पकड़ने लगे। आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज जैसी संस्थाओं ने इस दिशा में विशेष योगदान दिया। लेकिन कालान्तर में आर्यसमाज ने इस्लाम धर्म के विरोधी धर्म की-सी छवि ग्रहण की और ब्रह्मसमाज तो ईसाई धर्म के एक संशोधित संस्करण के रूप में ही सक्रिय रहा। श्रीनारायण गुरु की विशेषता इस बात में थी कि उन्होंने किसी नये धर्म की स्थापना नहीं की, बल्कि अपने प्रसिद्ध उपदेश से कि धर्म कोई भी हो, मानव का नेक होना काफी है से धार्मिक सद्भाव और सहिष्णुता को ठोस आधार प्रदान किया।

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