‘गुनाहों का देवता’ जैसे हर पीढ़ी के प्रिय उपन्यास और ‘अंधा युग’ जैसे सार्वकालिक सत्य के अन्वेषी नाटक के रचनाकार धर्मवीर भारती को उनके समय, स्वभाव और परिवेश के साथ व्यक्ति तथा लेखक के रूप में जानने के लिए इस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक है।
इस पुस्तक में उनके समकालीन साहित्यकारों, मित्रों, साथी लेखकों और सहकर्मियों के संस्मरण इकट्ठा किये गये हैं। ये संस्मरण उनके शुरुआती जीवन से लेकर ‘परिमल’ के दिनों और फिर लेखक तथा सम्पादक के रूप में उनके योगदान और अनेक ऐसी घटनाओं के बारे में बताते हैं जिन्हें जानना रुचिकर भी है और ज्ञानवर्द्धक भी।
पुस्तक में शामिल प्रत्येक संस्मरण उनके लेखक-व्यक्तित्व और जीवन-यात्रा को एक भिन्न धरातल पर याद करता है जिससे हमारे सामने भारती जी की एक मुकम्मल तस्वीर बनती है। इन संस्मरणों में हमें ऐसे कुछ सूत्र भी प्राप्त होते हैं जो उनकी कृतियों को नए सिरे से समझने में हमारी मदद करेंगे।
केशव चन्द्र वर्मा जैसे उनके पुराने मित्र का संस्मरण जहाँ भारती जी और ‘परिमल’ के आन्तरिक विवादों के बारे में बताता है, वहीं भारत यायावर का संस्मरण बताता है कि निराला जी ने उन्हें वसंत का गणित कैसे समझाया। विष्णुकांत शास्त्री के साथ उनकी बांग्लादेश की यात्रा और अमृतलाल नागर के संस्मरण में नागर जी के पुनःविवाह का वर्णन भारती जी के व्यक्तित्व के कुछ दिलचस्प पहलुओं को सामने लाते हैं। ढेरों सामग्री से चुने गये ये दुर्लभ संस्मरण भारती जी के साथ-साथ हिन्दी साहित्य के उस दौर का भी एक विहंगम दृश्य पाठक के सामने लाते हैं जब बहुत सीमित संचार-साधनों के बावजूद साहित्य कहीं ज्यादा जीवंत और ऊष्म गतिविधि होता था।


