‘ज़रतुष्ट्र ने यह कहा’ जर्मन साहित्य की अनुपम कृति है। नीत्शे का समस्त लेखन महत्त्वपूर्ण है, फिर भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यह पुस्तक उनके विचार-दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है। ‘ईश्वर मर चुका है’ इसी पुस्तक में कहा गया है। ‘महामानव’ और ‘शक्ति की इच्छा’ जैसे विचार इसी में अभिव्यक्त किए गये हैं। इसमें व्यक्त परिपक्व दर्शन और उसकी प्रधानता के कारण कुछ लोग ‘ज़रतुष्ट्र ने यह कहा’ को दार्शनिक कृति मानते हैं तो कुछ इसे उपन्यास कहते हैं। वस्तुतः साहित्य और दर्शन की दुनिया में ऐसी कृतियाँ कम ही होंगी जिनमें दार्शनिकता और औपन्यासिकता का ऐसा संयोग दिखता है।

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