सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज की कविताएँ रोज़मर्रा के अनुभवों को अस्तित्वगत चिन्ताओं, नैतिक जिज्ञासाओं के बिम्बों में बदलने का जतन करती हैं। सत्यार्थ शब्दों को सीधे, सपाट दार्शनिक कथनों में बदल देने के सरल मार्ग पर नहीं, उन्हें कविता के संवेदनासम्पृक्त वक्तव्यों में ढालने के चुनौती-भरे रास्ते पर चलते हैं। कवि ने तुरन्त सम्प्रेषित हो जाने वाली सरलता के बजाय संवेदना, विचार और सांस्कृतिक स्मृति के संवाद से सम्भव होने वाली काव्य-भाषा अपनाने का निर्णय किया है। यह निर्णय किसी आरोपित दार्शनिक भंगिमा में नहीं माँ, पिता और गाँव-घर से लेकर महानगर तक, दैनंदिन जीवन से लेकर देवता तक, दीवार, दरवाज़े और पर्यावरण तक सभी को विशिष्ट काव्य-विधि के वृत्त में लाने में परिणत होता है। इस सही निर्णय की पृष्ठभूमि में है माँ, जो “तब ज़रूर बोलती थी, जब चुप रहना अपराध लगता था उसे”।
यह कविता-संग्रह ‘आमुख’ , आरम्भ है कवि, कविता और भावक के ऐसे संवाद का, जिसमें सांस्कृतिक, मिथकीय स्मृतियों और जीवन-वास्तव को समेटते सर्जनात्मक अवकाश में जीवन की, स्मृतियों की अर्थ-समृद्ध अनेक परतों को अस्तित्वगत चिन्ताओं के व्यापक नैतिक सन्दर्भ में स्थापित किया जा सके। सतत संवाद ही कवि का लक्ष्य है; कविता का धर्म है, यहाँ, “पूर्ण विराम की आशा व्यर्थ है”।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल


