अगर हम उन कारणों पर विचार करें, जो रचना को कालजयी बनाते हैं तो हम पाएँगे कि हर कालजयी रचना अपने समय की जटिलताओं से टकराती है और उसे पार कर अपने समय से बाहर चली जाती है। राकेश कबीर की कविताएँ अपने समय की जटिलताओं से टकराती हैं। नदी, लोकतंत्र, चुप्पी और कोलाहल, ज़िन्दगी के सबक बनकर उनकी कविताओं में आते हैं। उनकी कविताओं में एक सघन आत्मविश्वास है जो उन्हें ‘हम न मरब, मरिहैं संसारा’ वाले कबीर के पास ले जाकर खड़ा करता है। कवि जाने-पहचाने शब्दों से अपना प्रतिपक्ष गढ़ता है। ये शब्द कवि को विरासत में मिले हैं, पर कवि ने उन्हें संघर्षों के रंग में रंगकर नया अर्थ दे दिया है। एक-एक शब्द में कवि का मन झाँकता है, कवि शब्दों को अस्त्र की तरह इस्तेमाल करना भी जानता है और उन्हें सिरहाने रखकर सोना भी।
राकेश कबीर का अनुभव संसार बहुआयामी और बहुस्तरीय है। भारतीय समाज के विभिन्न यथार्थ को उनकी पैनी दृष्टि इस तरह भेदती है कि उसका एक्स-रे हो जाता है। यहाँ सत्ता, तंत्र, मठाधीश, सरमायेदार और बिचौलिये, सब बेनक़ाब हैं। मात्र यही नहीं गाँव, शहर, पानी, पर्यावरण, प्राइमरी पाठशाला, विश्वविद्यालय, धर्म, धन्धा, वसन्त और पतझड़, सबका डीएनए टेस्ट कराता है कवि। यह कवि का साहस है कि वह ऐसी बातें बहुत ही सहजता से कह देता है, जिन्हें कहने में अन्य कवियों को हज़ार बार सोचना पड़ता है।
—दिनेश कुशवाह


