मेरी कविताएँ मेरे भोगे हुए जीवन की असीमित यातनाएँ हैं। इन्हें लिखते समय मैं कभी रोया हूँ, कभी क्रोध से पागल हो उठा हूँ, तो कभी अनायास किसी सार्थक बिम्ब के हाथ आ जाने पर बच्चों की तरह किलकारी मार घंटों हँसा हूँ।
वैसे, मैं नहीं जानता कि मैं कविता क्यों लिखता हूँ? हाँ, इतना अवश्य जानता हूँ कि वर्ण-जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छूत-छात, पाखंड, शोषण, दमन और अत्याचार का शिकार जब मैं स्वयं होता हूँ या किसी सहोदर को होते हुए देखता हूँ, तो मेरे अन्दर कुछ उबलने लगता है, कुछ घुमड़ने लगता है, जिसे मैं शब्दों में पकड़ने और अभिव्यक्त करने की कोशिश करता हूँ, लेकिन पूर्ण को कभी पकड़ नहीं पाता हूँ। पूर्ण को एक साथ न पकड़ पाने की यह छटपटाहट ही अंश के रूप में मेरी कविताओं को जन्म देती चलती है।
ये कविताएँ पढ़ने के बाद यदि आपके अन्दर कुछ कुलबुलाने लगे, उबलने लगे, घुमड़ने लगे, टूटने लगे, पुराना या नया जुड़ने लगे, मात्र मनुष्य होने का भाव जगे, तो मैं अपने सृजन को सार्थक समझूँगा, अन्यथा समय नष्ट करने के लिए आपसे क्षमा चाहूँगा!
—मलखान सिंह


