जैसे रघुवीर सहाय की कविता सिर्फ़ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि ज़्यादा मानवीय आशयों में प्रगट होती थी, कुछ उसी तरह आर. चेतनक्रान्ति भी नितान्त राजनीतिक कवि नहीं हैं—आमफ़हम मुहावरे में कहें तो वे वृहत्तर सरोकारों के कवि हैं, वे नई बन रही सभ्यता की विडम्बनाओं को पहचानते हैं और इसमें आदमी बने रहने की मुश्किलों को भी। उनकी ज़्यादातर कविताएँ इस नई बनती दुनिया से तालमेल बिठाने, उसमें अपने लिए जगह और मानी खोजने, इसकी व्यर्थताओं को समझने और इसके संकटों से जूझने की कोशिश के बाँध बनाती हैं। लेकिन इन कविताओं में आत्मदया, तकलीफ़, शहादत या हाय-हाय का भाव नहीं है, इसकी जगह एक साफ़-शफ़्फ़ाफ दृष्टि और उससे भी साफ़ ज़ुबान है जिसे मालूम है कि ‘रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों’। तमाम पस्तियों और फ़िक्रों के बीच उन पर हँसने की कूवत रखता और बेफ़िक्र लगता ये ग़ालिबाना अन्दाज़ चेतन की लगभग सारी कविताओं में पहचाना जा सकता है। ध्यान दें तो यह वह चीज़ है जो चेतन की कविता को कातर होने से बचाती है और हक़ीक़त पर उनकी बेहद ठोस पकड़ को किसी करुणा के प्रवाह में बह जाने से रोकती है। सत्तर और अस्सी के दशक की क्रान्तिकारी मुद्रा अपनाने वाली और नब्बे के दशक की ख़ामोशी ओढ़ लेने वाली हिन्दी कविता के बरक्स चेतन अपने इसी अन्दाज़ से एक नया मुहावरा बनाते हैं। यह न क्रान्तिकारी कविता है, न चुप कविता है लेकिन इसके बोलने में ज़माने की एक हक़ीक़त बोलती है और उसके साथ गुत्थमगुत्था इनसान बने रहने की जद्दोजहद भी।
—प्रियदर्शन


