अरुणाचल प्रदेश की समकालीन कविता का प्रतिनिधित्व करने वाली कवि गुम्पी ङूसो की ये कविताएँ स्वर्णिम भूमि कहे जाने वाले उस प्रदेश के जीवन की, उसकी कठिनाइयों और ख़ुशियों की लगभग सम्पूर्ण अक्कासी करती हैं।
भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित अरुणाचल को वनों, पर्वतों, घाटियों और सरिताओं का उपवन कहा जाता है। प्रकृति की इस अनन्त सम्पदा और उससे प्रेरित मानवीय भावनाओं के साथ इन कविताओं में वहाँ के कठिन जीवन, निकटवर्ती सीमा और सरहद के उस पार चीन की विस्तारवादी सैन्य-शक्ति की काली छाया, सन् '62 के चीनी हमले की दुखद स्मृतियों, स्थानीय जनजातियों की आस्था, अस्तित्व के उनके संघर्षों, और संस्कृति की छायाएँ भी दिखाई पड़ती हैं।
गुम्पी एक सफल अभिनेत्री और लोक-कलाकार भी हैं, इसलिए उनकी भाषा में लय के साथ चित्रात्मकता का भी सन्तुलित पुट मिलता है। अपनी नवीन दृष्टि, प्रवाहमयता और अरुणाचल की नैसर्गिक भूमि से प्राप्त उदात्तता इन कविताओं को विशिष्ट बनाती है।
इस कविता-पुस्तक को कवि ने दो खंडों में विभक्त किया है। पहले खंड में अरुणाचल प्रदेश है, और दूसरे खंड में उनके अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों को अभिव्यक्ति मिली है।
हिन्दी पाठक को यह कविता-संचयन निश्चय ही नवीन आस्वाद प्रदान करेगा।


