छद्म विज्ञान को सरल भाषा में कहें तो यह विज्ञान के नाम पर धोखाधड़ी है, जिसके शिकार अशिक्षित ही नहीं, पढ़े-लिखे और तर्क को अहमियत देने वाले लोग भी होते हैं। विश्व-प्रलय के बीच-बीच में किये जाने वाले दावे, प्राचीनकाल में भी वे सब सुविधाएँ थीं जो आज हमारे पास हैं, एलियनों के हमले, फल-ज्योतिष, ग्रहों और सितारों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव, किस्म-किस्म के पत्थरों का चमत्कारी प्रभाव, और ऐसे कई लोकप्रिय और लगभग वैज्ञानिक प्रतीत होने वाले विश्वास इन लोगों को भी अपने दायरे में ले लेते हैं।
‘छद्म विज्ञान : नया पाखंड’ पुस्तक विज्ञान के इसी छद्म तंत्र का पर्दाफाश करती है। परशराम राऊ आर्डे इस नकली विज्ञान के विरुद्ध वास्तविक विज्ञान को स्थापित करने में जुटे सक्रिय और जुझारू कार्यकर्ता हैं। इस पुस्तक में वे विस्तारपूर्वक और तर्कों के साथ बताते हैं कि छद्म विज्ञान को हम कैसे पहचानें, छद्म विज्ञान के पीछे क्या मनोविज्ञान काम करता है, और इस संक्रामक बीमारी से एक सामान्य नागरिक कैसे बचे।
पुस्तक चार खंडों में विभाजित है। पहला खंड विज्ञान और समाज के अन्तर्सम्बन्धों पर केन्द्रित है, दूसरा खंड पूरी तरह छद्म विज्ञान के दूरगामी और विनाशकारी प्रभावों का उद्घाटन करता है, तीसरे खंड में छद्म विज्ञान को लेकर कुछ ‘केस-स्टडीज’ दी गई हैं और चौथे खंड में महाराष्ट्र ‘अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के कार्यकर्ताओं और कुछ विश्व-स्तरीय विचारकों के संघर्षों का विवरण प्रस्तुत किया गया है।
