वाजिद अली शाह (1822-1887) अपने पिता नवाब अमजद अली शाह के देहान्त के बाद सन् 1847 में अवध की गद्दी पर बैठे। संगीत और नृत्य का शौक़ उन्हें बेइन्तिहा था, लेकिन पिता के अंकुश के चलते बादशाह बनने तक दबा रहा, लेकिन बादशाह बनते ही यह शौक़ फिर से जाग उठा और परवान चढ़ा। उनका उपनाम ‘अख़्तर’ था। वह अवध के सर्वाधिक लोकप्रिय बादशाह थे। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने शास्त्रीय नृत्य, संगीत और अवध के लोकसंगीत को ख़ूब बढ़ावा दिया। एक बेहतरीन लेखक और शायर के तौर पर उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 100 पुस्तकें लिखीं, हिन्दुस्तानी थियेटर की नींव डाली और उसके लिए रासलीला को अपनाया। उन्होंने अवधवासियों को यह शिक्षा दी कि ‘तुम न हिन्दू हो, न मुसलमान, तुम केवल इनसान हो, और एक लखनवी की यही पहचान होनी चाहिए कि वह केवल इनसान है, लखनवी है’।
‘फ़न-ए-मौसीक़ी’ अवध के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह की संगीत, नृत्य और नाट्य विषयक पाँच महत्त्वपूर्ण पुस्तकों—‘सौतुल मुबारक’, ‘नाजो’, ‘दुलहन’, ‘बनी’, ‘चंचल नाज़नीन’ की एकत्र प्रस्तुति है। इनमें ‘सौतुल मुबारक’ पुस्तक फारसी में तथा बाक़ी चार पुस्तकें उर्दू में लिखी गई थीं। उर्दू लिपि में लिखी गई इन पुस्तकों में अवधी, ब्रज, उर्दू, सिन्धी, अंग्रेज़ी तथा बांग्ला भाषा के शब्द प्रयुक्त हुए हैं। मुख्यतः इनकी भाषा अवधी है।
इस ग्रन्थ में शामिल सभी पुस्तकों के अनुवाद के लिए रौशन तक़ी ने सभी ऐतिहासिक सन्दर्भों और भाषा की सभी बारीकियों को ध्यान में रखा है। इस प्रस्तुति के माध्यम से पाठक सुल्तान-ए-आलम वाजिद अली शाह ‘अख़्तर’ की संगीत प्रतिभा से परिचित हो सकेंगे।

